केमास/शाक्य गणराज्य की राजधानी कपिलवस्तु ( नेपाल) में जयसेन का पुत्र सिंह-हनु हुआ,सिंह-हनु का विवाह कचचाना से हुआ। सिंह-हनु के पांच पुत्र क्रमशः शुद्धोधन, धौतोधन, शुक्लोदन, शाक्योंधन, अमितोदन और दो पुत्री अमिता प्रमिता हुए।
शुद्धोधन का विवाह महामाया से हुआ। शुद्धोधन और महामाया से विश्व विख्यात सिद्धार्थ का जन्म वैशाखी पूर्णिमा ईसा पूर्व 563 में लुम्बिनी वन में हुआ। रोहिणी नदी पानी को लेकर शाक्यों और कोलियो में विवाद युद्ध तक पहुंच गया।
शाक्य संघ में सदस्य के रूप में सिद्धार्थ का मत था कि”बैर से बैर नहीं” बैर को अबैर से खत्म किया जा सकता है। ” सम्भावित युद्ध को देखकर शांति-समझौते का अपना अभिमत देने के कारण सिद्धार्थ ने गृह निष्कासन का दंड स्वीकार किया। मानव-मानव में शांति-मैत्री के लिए इतनी बड़ी सजा स्वीकारना मानव इतिहास की महान घटना है।
उनतीस वर्ष की आयु में पत्नी यशोधरा की अनुमति और पुत्र राहुल को त्याग कर सिद्धार्थ गौतम ने गृह त्यागा। कुछ समय बाद ही कोलियो और शाक्यों ने सिद्धार्थ के त्याग से समझ आई और युद्ध की जगह पर समझौते का मार्ग अपनाकर सिद्धार्थ को वापस घर लौटने की विनती की, पर अब सिद्धार्थ गौतम बुद्ध विश्व के महान दुखों से अवगत हो करके उनके निवारण को बुद्ध संकल्पित हो चुके थे।
तमाम साधु-संतों, ऋषि-मुनियो से मिलते और इसकी ज्ञान की सर्वोच्च अवस्था और दुःखो का निवारण न जानने तक वे कठिन से कठिन साधनाओं से गुजरे और अंत में वैशाखी पूर्णिमा को सम्यक सम्बोधि का ज्ञान विपश्यना के माध्यम से प्राप्त किए।
सम्यक सम्बोधि के बाद सिद्धार्थ गौतम”बुद्ध” कहलाये। उन्होंने जाना कि सब कुछ अनित्य है, सब कुछ परिवर्तन शील है, दुःख है–दुःख कारण, दुःख का निवारण है और दुःख के निवारण का उपाय भी है।
त्रिशरण, पंचशील, अष्टांगिक मार्ग, दस परमिताये के पालन से कोई भी मानव सम्यक सम्बुद्ब प्राप्त कर”बुद्ध” बन सकता है। इस प्रकार उन्होंने शील, समाधि, प्रज्ञा के रास्ते पर चलकर “निर्वाण” प्राप्त का मार्ग सुगम बनाया।
बोधगया (विहार) में वैशाखी पूर्णिमा का सम्यक सम्बोधि के बाद, सारनाथ उ.प्र.मे प्रथम उपदेश दिया, जो धम्म चक्क पवत्तन के नाम से विश्व में प्रसिद्ध है। इसके बाद महाराजा प्रसेनजीत, बिम्बिसार, अंगुलिमाल, पटाचारा, कृषा गौतमी, अनाथपिंडक, प्रकृति, यशोधरा, महाप्रजापति गौतमी, सोपाक सूप्पिय , सुप्रबुद्ध, सुमंगल, सुभद्र , महान मौद्दगललायन,, सुभद्र सभी उच्च और निम्न को समवोधि से उनका कल्याण कर विश्व को शांति-मैत्री , करूणा का मार्ग दिया।
तथागत गौतम बुद्ध 80वर्ष की अवस्था में वैशाखी पूर्णिमा को ईसा पूर्व 483 में कुशीनारा उ.प्र.मे महापरिनिर्वाण को प्राप्त हुए।
बुद्ध की करूणा, मैत्री शिक्षा से प्रिय दर्शी सम्राट अशोक इतने अधिक प्रभावित हुए कि उनका पूरा जीवन ही बदल गया। बुद्ध के शिक्षाओं के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने अपने राजकीय संसाधनों को समर्पित कर दिया और बुद्ध धम्म को विश्व व्यापी बनाया। इस कार्य में उन्होंने अपने पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा को भी भिक्षु संघ को दान कर दिया।
ईसा पूर्व 78 में शासक कनिष्क और 7वी सदी में सम्राट हर्षवर्धन ने बुद्ध की धम्म ध्वजा को विश्व पटल पर फहराया।20वी सदी में विश्व के महान विद्वान, सिम्बल आफ नालेज बाबा साहेब डॉ आंबेडकर ने”भारत के संविधान के माध्यम से समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय से बुद्ध की शिक्षाओं को भारत में प्रतिष्ठापित किया,जिसे विश्व के पटल पर भारत को विकसित देशों की पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया।
धन्य है चीनी यात्री एवं बौद्ध भिक्षु ह्वेनसांग और फाहियान की’भारत यात्रा का वृत्तांत’जिसने भारत के गौरवशाली इतिहास में विश्व पटल पर परोस दिया।
आज बुद्ध की शिक्षाओं से सारा विश्व लाभान्वित हो रहा है और 125 देशों में बुद्ध की शिक्षाओं को अपने शासन और प्रशासन में अपनाया जा रहा है। जिससे विश्व कल्याण और मैत्री की ओर तेजी से बढ़ रहा है। यह मानवता के लिए मंगल दायी संदेश है।
संसार को मेरी नज़र में ऐसा पहला सरल मार्ग बुद्ध ने दिया’ जिस पर चलकर कोई भी मानव”बुद्ध”( सर्वोच्च ज्ञान प्राप्त) बन सकता है।” ज्ञान की सर्वोच्च अवस्था प्राप्त कर” बुद्ध विश्व में सर्व प्रथम महाकारूणिक , करूणा के सागर प्रतीत होते हैं।
आइए हम सब स्टाम्प एवं निबंधन परिवार बुद्ध की करूणा मैत्री शिक्षाओं को जाने और जीवन में अमल में लाये।
बुद्ध पूर्णिमा पर आप वरिष्ठ आदरणीय महोदय एवं समस्त मित्रगण एवं सम्मानित विभाग के अधिकारियों को हार्दिक मंगलकामनाएं
साधु साधु साधु।
भवतु सब्ब मंगलं।
सब का मंगल हो।
सब का कल्याण हो
