सोशल आडिट में प्रधानों का रुचि न लेना दर्शाता है भ्रष्टाचार चरम पर है

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अंबेडकर नगर

पंचायती राज व्यवस्था के तहत हर ग्राम पंचायत के वार्षिक सोशल आडिट का प्रावधान है। संबंधित अधिकारियों को आडिट आपत्तियों के निस्तारण का भी निर्देश है। यह दीगर बात है कि जिले में कहीं भी सोशल आडिट नहीं हो रहा है। अगर हो भी रहा है तो ग्राम प्रधान इसमे रुचि नही ले रहा है। कहीं सोशल आडिट हुआ भी तो उस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। अकबरपुर विकासखंड के गांव की तमाम आपत्तियां आईं लेकिन उनका निस्तारण नहीं किया गया। इसी प्रकार ब्लॉक भियांव एवं विकास खण्ड अकबरपुर में भ्रष्टाचार चरम पर है। शौचालय,विद्यालय की मरम्मत,खड़न्जा निर्माण, प्रधानमंत्री आवास, स्ट्रीट लाइट और कोविड-19 इत्यादि मामलों में शासन से मिले धन का व्यापक पैमाने पर भ्रष्टाचार किया जा रहा है। ग्रामीणों द्वारा आवाज उठाने पर दबंग प्रधानपति ग्रामीणों को धमकियां देता है।

ग्राम पंचायतें प्रधान व सेक्रेटरी के हाथ की कठपुतली बन गई हैं। गांवों में खुली बैठक बुलाए बगैर कागजी खानापूरी की जा रही है। ग्राम प्रधान अपने घर पर खुली बैठक के नाम पर सदस्यों से हस्ताक्षर करा लेते हैं। बिना प्रस्ताव व अनुमोदन के विकास संबंधी काम हो रहा है। पंचायतों का सोशल आडिट न होने से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है। उच्चाधिकारी भी सोशल आडिट की अनदेखी कर रहे हैं। लेकिन कुछ दिन से सोशल ऑडिट का कार्य किया जा रहा है लेकिन उसमें प्रधान रुचि नहीं ले रहा है।

ग्राम पंचायतों के गठन के बाद चुनाव आयोग पंचायतों की खुली बैठक की तिथि निर्धारित करता है। उसी दिन हर ग्राम पंचायतों में खुली बैठक की औपचारिकता पूरी की जाती है। ग्राम प्रधान पंचायत का अध्यक्ष व ग्राम विकास व पंचायत अधिकारी सचिव होते हैं। नियमानुसार खुली बैठक पंचायत भवन व ग्राम प्रधान की अध्यक्षता में होनी चाहिए। इसका प्रस्ताव सेक्रेटरी को लिखना चाहिए। यह दीगर बात है कि सेक्रेटरी किसी गांव में बैठक लेने जाते ही नहीं हैं। वे कई गांवों के चार्ज होने की बात कहकर ¨पड छुड़ा लेते हैं।
खुली बैठक के नाम पर ग्राम प्रधान समर्थकों को अपने घर पर एकत्रित कर लेते हैं। घर पर इसलिए बैठक बुलाई जाती है ताकि यहां विरोधी आएंगे ही नहीं। ग्राम प्रधान नई कापी खरीद लेते हैं लेकिन उस पर कोई प्रस्ताव नहीं लिखा जाता। ग्रामीणों से कहा जाता है कि प्रस्ताव सेक्रेटरी ही लिखेंगे। कापी पर कार्यवाही की जगह छोड़कर ग्राम पंचायत सदस्यों व ग्रामीणों के हस्ताक्षर करा लिए जाते हैं। उनसे अपनी मांग लिखकर मांगी जाती है। हस्ताक्षर बनाने के बाद प्रधान रजिस्टर लेकर सेक्रेटरी मिलते हैं उसके बाद प्रस्ताव तैयार होता है। किस कार्य का प्रस्ताव हुआ या गांव में कौन-कौन कार्य होगा यह न तो किसी सदस्य को पता है नहीं किसी ग्रामीण को। इसके बाद मनमाना काम व लूट-खसोट का सिलसिला शुरू हो जाता है। प्रधान सचिव की मनमानी से नाराज होकर गांव के लोगों द्वारा उच्चाधिकारियों के पास तक शिकायत पहुंचाई गई उसके पश्चात भी प्रधान द्वारा निर्माण का काम किए जा रहे हैं। शिकायत की नहीं होती जांच । गांवों में विकास कार्यों में पैमाने पर अनियमितता की जा रही है। यहां तक कि आवासों या शौचालयों का निर्माण भी नहीं होता और गुपचुप ढंग से प्रधान व सेक्रेटरी फर्जी कागजात तैयार कर शासकीय धन का बंदरबाट कर ले रहे हैं। अम्बेडकर नगर के लगभग सभी विकासखंड के कई गांव के लोग शिकायत कर चुके हैं उनके गांव में खुली बैठक बुलाए बगैर काम हो रहा है। ग्रामीणों की ऐसी शिकायतें ब्लाक मुख्यालय पहुंचने के बाद कूड़ेदान में चली जाती हैं

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