जब आजमगढ़ की धरती पर उतरे थे बापू October 01, 2026
आजमगढ़। आज दो अक्टूबर है। कैलेंडर पर दर्ज एक तारीख। सरकारी कार्यालयों में अवकाश, स्कूलों में प्रभातफेरी, गांधी प्रतिमाओं पर माल्यार्पण और जगह-जगह स्वच्छता का संकल्प। लेकिन आजमगढ़ के लिए गांधी जयंती सिर्फ इतना भर नहीं है। इस तारीख के साथ इस शहर की स्मृतियों में एक ऐसा रिश्ता जुड़ा है, जिसे 97 साल बाद भी इतिहास की धूल ढक नहीं सकी है।
आजमगढ़ की धरती पर महात्मा गांधी के कदम पड़े थे। वह दौर था जब देश अंग्रेजी हुकूमत की बेड़ियों में जकड़ा था और आजादी अभी सपना थी। लेकिन उस सपने को हकीकत मानकर जीने वाले लोग पैदा हो चुके थे।
3 अक्टूबर 1929 महात्मा गांधी आजमगढ़ पहुंचे। श्रीकृष्ण पाठशाला में उनका संबोधन सुनने के लिए हजारों नहीं, बल्कि करीब 75 हजार लोगों की भीड़ जुटने का उल्लेख मिलता है। उस दौर में न सोशल मीडिया था, न टेलीविजन, न इंटरनेट। सूचना का माध्यम अखबार, संदेशवाहक और लोगों की जुबान थी। फिर भी गांधी के आने की खबर ऐसी फैली कि पूरा शहर मानो एक ही दिशा में चल पड़ा। यह सिर्फ किसी बड़े नेता की सभा नहीं थी। यह उस भारत की बेचैनी थी, जो अपने भविष्य को अपनी मुट्ठी में लेना चाहता था।समय और कैलेंडर
भौगोलिक संदर्भ
गांधी के शब्दों में आजमगढ़ ने सुना था स्वराज का सपना
गांधीजी ने आजमगढ़ में जिन मुद्दों पर जोर दिया, उनमें स्वदेशी, सामाजिक सुधार और वंचित तबकों का उत्थान शामिल था। उनके लिए आजादी केवल अंग्रेजों को देश से बाहर करने का नाम नहीं थी। वह ऐसी आजादी चाहते थे जिसमें समाज के आखिरी व्यक्ति की गरिमा भी सुरक्षित हो।
यही गांधी का सबसे बड़ा संदेश था।
उनके लिए चरखा केवल धागा कातने का साधन नहीं था। खादी केवल कपड़ा नहीं थी। स्वदेशी केवल विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का कार्यक्रम नहीं था।
इन सबके पीछे एक विचार था—आत्मनिर्भरता।
आज जब हम स्थानीय उत्पाद, रोजगार, स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता की बातें करते हैं, तब 1929 के आजमगढ़ में गांधी का दिया संदेश नए अर्थों में याद आता है। ऐतिहासिक स्रोत बताते हैं कि अगले दिन गांधीजी ने आजमगढ़ में खादी विद्यालय का उद्घाटन भी किया। उनकी यात्रा ने यहां राष्ट्रीय आंदोलन की भावना को और मजबूती दी।
शिब्ली मंजिल में गांधी: एक ऐसी तस्वीर, जो इतिहास से बड़ी है
आजमगढ़ और गांधी का रिश्ता केवल एक विशाल जनसभा तक सीमित नहीं था। 3 अक्टूबर 1929 को गांधीजी शिब्ली मंजिल भी गए थे। गांधीजी की अपनी लिखी चिट्ठियों के संकलन में दर्ज है कि मौलाना सुलेमान नदवी उन्हें शिब्ली मंजिल दिखाने ले गए थे। गांधी ने वहां मौजूद अरबी और उर्दू पुस्तकों का भी उल्लेख किया।
पत्रकार चंद्रशेखर यादव



















