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मऊ। कलेक्ट्रेट स्थित अधिवक्ता कक्ष सभागार में स्वतंत्रता सेनानी, वरिष्ठ अधिवक्ता एवं राजनेता पद्मनाथ सिंह की 113वीं जयंती श्रद्धापूर्वक मनाई गई। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने उनके स्वतंत्रता संग्राम, विधि क्षेत्र और समाजहित में किए गए योगदान को याद करते हुए उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला।

25 अगस्त 1913 को मऊ के परदहा में रामरहस्य सिंह एवं हरचंदो देवी के घर जन्मे पद्मनाथ सिंह ने प्रारंभिक शिक्षा जीवन राम इंटर कॉलेज से प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा एवं वकालत की पढ़ाई पूरी की। राष्ट्रप्रेम से प्रेरित होकर उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की और वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी हिस्सा लिया, जिसके चलते उन्हें गिरफ्तार किया गया।

वकालत के क्षेत्र में उनकी मजबूत पकड़ और प्रभावशाली जिरह शैली के कारण वे पूर्वांचल के प्रसिद्ध अधिवक्ताओं में शामिल हुए। वर्ष 1935 से 1958 तक आजमगढ़ में अधिवक्ता के रूप में सेवाएं दीं। वर्ष 1991 में उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में सम्मानित किया गया।

पद्मनाथ सिंह अखिल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी समिति के उपाध्यक्ष रहे। विधायक के रूप में जमींदारी उन्मूलन से जुड़े कार्यों में भी योगदान दिया। कानून, शिक्षा, भारतीय चुनाव व्यवस्था, न्याय व्यवस्था और संविधान जैसे विषयों पर उनके लेख प्रकाशित हुए।

19 अप्रैल 1993 को उनका निधन हुआ। वक्ताओं ने कहा कि पद्मनाथ सिंह का जीवन स्वतंत्रता, राष्ट्रप्रेम, कानून और जनसेवा के प्रति समर्पण का प्रतीक है। उनकी 113वीं जयंती पर उन्हें याद करना नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है। आने वाली पीढ़ियां भी उनके योगदान को सम्मान और श्रद्धा के साथ याद करती रहेंगी।

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