सुल्तानपुर
भारतीय संविधान के निर्माता, भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर ने आज से 69 साल पहले 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर की दीक्षाभूमि पर अपने 5 लाख से अधिक अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी। इस दिन को बौद्ध अनुयायी *धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस* और *अशोक विजयादशमी* के रूप में मनाते हैं।
*क्यों किया था धर्म परिवर्तन?*
बाबा साहेब का जन्म महार जाति में हुआ था, बचपन से ही उन्हें छुआछूत, जातिगत भेदभाव और अपमान का सामना करना पड़ा। उनका मानना था कि हिंदू धर्म की वर्ण व्यवस्था और मनुस्मृति में असमानता की जड़ें इतनी गहरी हैं कि उसमें रहकर दलितों का उत्थान संभव नहीं है।
1935 में नासिक के येवला सम्मेलन में उन्होंने ऐतिहासिक घोषणा की थी – *”मैं हिंदू के रूप में पैदा हुआ हूँ, लेकिन हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं।”*
इसके बाद 21 साल तक उन्होंने सभी धर्मों का अध्ययन किया और अंत में बौद्ध धर्म को चुना, क्योंकि:
*1. समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व:* बौद्ध धर्म में प्रज्ञा, करुणा और समता है, जो हिंदू धर्म के चतुर्वर्ण के ठीक विपरीत है।
2. वैज्ञानिक और तर्कसंगत धर्म:बाबा साहेब ने कहा था – धर्म मनुष्य के लिए है, मनुष्य धर्म के लिए नहीं।
3. अशोक से जुड़ाव: उन्होंने यह दिन इसलिए चुना क्योंकि इसी दिन ईसा पूर्व तीसरी सदी में सम्राट अशोक ने भी बौद्ध धर्म ग्रहण किया था।
22 प्रतिज्ञाएं
धर्म परिवर्तन के समय बाबा साहेब ने अपने अनुयायियों को 22 प्रतिज्ञाएं दिलवाईं – जिसमें हिंदू देवी-देवताओं में अविश्वास, ब्राह्मणों से पूजा न करवाना, जातिभेद को न मानना और समानता व नैतिकता को अपनाना शामिल था।
दीक्षाभूमि आज भी बौद्धों के लिए पवित्र तीर्थ स्थल है, जहाँ हर साल हजारों लोग बौद्ध धर्म अपनाते हैं।

















