आजाद समाज पार्टी से बसपा के समीकरण पर नजर अक्टूबर 13, 2026तैयारियों की समीक्षा तेज की, राजनीतिक दल बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करने में जुटे।
बेरोजगारी और महंगाई के मुद्दों पर भाजपा की परीक्षा, कमजोर संगठन कांग्रेस के लिए चुनौती।
आजमगढ़। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर आजमगढ़ में प्रशासनिक तैयारियों के साथ राजनीतिक गतिविधियाँ भी तेज होने लगी हैं। समाजवादी पार्टी, भारतीय जनता पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस, आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) और असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम सहित विभिन्न दल अपने संगठन को मजबूत करने और चुनावी रणनीति बनाने में जुटे हैं। जिले की सभी 10 विधानसभा सीटों पर संभावित मुकाबले को लेकर राजनीतिक चर्चाएँ शुरू हो गई हैं।
जिला निर्वाचन अधिकारी एवं जिलाधिकारी की अध्यक्षता में चुनावी तैयारियों की समीक्षा की गई। इसमें मतदाता सूची पुनरीक्षण, लंबित प्रपत्रों के निस्तारण, बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) की सक्रियता और 5 मतदान केंद्रों पर जरूरी सुविधाओं की उपलब्धता पर जोर दिया गया। जिला निर्वाचन कार्यालय परिसर स्थित ईवीएम वेयरहाउस में 12 अक्टूबर से ईवीएम और वीवीपैट मशीनों की प्रथम स्तरीय जांच शुरू होने की जानकारी भी सामने आई है। प्रशासन की ओर से पोलिंग पार्टी रवानगी स्थल और मतगणना केंद्रों का निरीक्षण भी किया गया है।
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने आजमगढ़ जिले की सभी 10 सीटों पर जीत दर्ज की थी। ऐसे में पार्टी 2027 में अपने PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण के सहारे जनाधार बनाए रखने की कोशिश करेगी। हालांकि, असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम की सक्रियता से कुछ सीटों पर मुकाबले को लेकर नई चर्चा हो सकती है। यदि पॉपएआईएमआईएम स्थानीय स्तर पर मजबूत उम्मीदवार उतारती है, तो अल्पसंख्यक मतदाताओं के बीच विभिन्न दलों की अपील चुनावी बहस का विषय बन सकती है। इसका सपा पर कितना असर होगा, यह उम्मीदवारों और मतदाताओं के रुख पर निर्भर करेगा।
भाजपा आजमगढ़ में बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने पर जोर दे रही है। पार्टी की रणनीति सपा के प्रभाव वाले क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाने और स्थानीय मुद्दों के जरिए मतदाताओं से संपर्क मजबूत करने की हो सकती है। दूसरी ओर, बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास जैसे मुद्दे चुनावी बहस में अहम रह सकते हैं। विपक्ष इन सवालों के जरिए भाजपा को घेरने की कोशिश कर सकता है, जबकि भाजपा को अपनी योजनाओं और उपलब्धियों के आधार पर जनता के बीच समर्थन बनाए रखना होगा।
बसपा अपने पारंपरिक दलित मतदाता आधार को मजबूत करने और अन्य सामाजिक वर्गों तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश में जुट सकती है। वहीं, चंद्रशेखर आजाद की अगुवाई वाली आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) की सक्रियता से कुछ सीटों पर नए राजनीतिक समीकरण बन सकते हैं। यदि पार्टी स्थानीय स्तर पर संगठन और उम्मीदवारों को मजबूत करती है, तो बसपा सहित अन्य दलों के चुनावी गणित पर उसका असर पड़ सकता है। हालांकि, किसी दल को निश्चित नुकसान होने का निष्कर्ष अभी निकालना जल्दबाजी होगी।
आजमगढ़ में कांग्रेस के लिए संगठनात्मक सक्रियता बढ़ाना और स्थानीय नेतृत्व को मजबूत करना महत्वपूर्ण होगा। सपा के साथ गठबंधन की स्थिति में सीटों का बँटवारा और कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल भी अहम भूमिका निभाएगा। यदि कांग्रेस जनता के बीच अपनी मौजूदगी बढ़ाने और स्थानीय समस्याओं पर लगातार आवाज उठाने में सफल नहीं होती, तो उसे चुनावी प्रतिस्पर्धा में कठिनाई हो सकती है।
फिलहाल आजमगढ़ में प्रशासनिक तैयारियों के साथ राजनीतिक गतिविधियाँ भी तेज हैं। सपा, भाजपा, बसपा, कांग्रेस, एआईएमआईएम और आजाद समाज पार्टी के लिए रोजगार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण रहेंगे। चुनावी नतीजों पर उम्मीदवारों, गठबंधन, प्रचार और मतदाताओं के फैसले का असर पड़ेगा।
पत्रकार चंद्रशेखर यादव





















