2027 की बिसातः उप्र की राजनीति में सामाजिक संतुलन की नई पटकथा

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डॉ. सुनील कुमार (राजनीतिक विश्लेषक , असिस्टेंट प्रोफेसर, जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग ) वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक समीकरण हमेशा से चुनावी सफलता की आधारशिला रही हैं। सूबे का राजनीतिक इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि कोई भी दल तब तक स्थायी सत्ता की इमारत खड़ी नहीं कर सकता, जब तक वह विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच एक सुदृढ़ संतुलन स्थापित न कर ले। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने वर्ष 2014 से लेकर 2024 तक के चुनावों में एक व्यापक सामाजिक गठबंधन के सहारे अभूतपूर्व सफलताएं प्राप्त की हैं लेकिन पिछले कुछ समय से राजनीतिक गलियारों और जमीन पर यह चर्चा तैरती रही है कि भाजपा के पारंपरिक ‘कोर वोटर’ माने जाने वाले ब्राह्मण समाज के एक वर्ग में कुछ अनकही असंतोष की भावना है।

ऐसे संवेदनशील समय में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की पृष्ठभूमि से आने वाले वरिष्ठ संगठनकर्ता नागेंद्रनाथ त्रिपाठी को भाजपा में ‘राष्ट्रीय संगठक, वरिष्ठ कार्यकर्ता-संपर्क’ जैसी अत्यंत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपा जाना केवल एक साधारण संगठनात्मक फेरबदल नहीं है। राजनीति के पंडित इसे 2027 की चुनावी बिसात पर भाजपा का एक बड़ा रणनीतिक कदम और गहरा राजनीतिक संदेश मान रहे हैं।

चार दशकों का सूखा और ब्राह्मण समाज की राजनीतिक टीस

यदि उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास के पन्नों को पलटें, तो स्वतंत्रता के बाद एक लंबे अरसे तक सत्ता की चाबी ब्राह्मण समाज के हाथों या उनके मजबूत प्रभाव में रही है। पंडित गोविंद वल्लभ पंत, सुचेता कृपलानी, चंद्रभानु गुप्त, कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा, श्रीपति मिश्र और नारायण दत्त तिवारी जैसे कद्दावर नेताओं ने सूबे की कमान संभाली।

एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि 1989 में नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद, यानी पिछले लगभग चार दशकों (37 वर्षों) से उत्तर प्रदेश की गद्दी पर कोई भी ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं बैठ सका है।

इस लंबे अंतराल ने इस समाज के भीतर एक मूक राजनीतिक कसक पैदा की है। राम मंदिर आंदोलन के दौर से लेकर भाजपा के राष्ट्रीय क्षितिज पर उभार तक, ब्राह्मण समाज ने भगवा दल को वैचारिक और चुनावी, दोनों स्तरों पर रीढ़ की हड्डी बनकर सहारा दिया मगर हाल के वर्षों में विपक्ष ने इसी ‘चार दशक के सूखे’ और प्रशासनिक उपेक्षा की भावना को हवा देकर ब्राह्मणों को साधने की पुरजोर कोशिश की है। समाजवादी पार्टी (सपा) द्वारा ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित करना और हाल के दिनों में संतों व शंकराचार्यों को अपने पक्ष में खड़े करने की कोशिशें इसी रणनीति का हिस्सा हैं।

नागेंद्रनाथ त्रिपाठी: परदे के पीछे से धागा पिरोने वाले शिल्पकार

नागेंद्रनाथ त्रिपाठी का नाम भाजपा और संघ के उन कद्दावर नेताओं में शुमार है जिन्होंने चमक-दमक और मंच से दूर रहकर, परदे के पीछे संगठन की नींव को मजबूत किया है। संत कबीर नगर की माटी से निकलकर उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, संघ और भाजपा संगठन में चार दशक से अधिक समय तक तपस्या की है।

उत्तर प्रदेश के संगठन महामंत्री, उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड के क्षेत्रीय संगठन महामंत्री तथा बिहार-झारखंड के क्षेत्रीय संगठन महामंत्री के रूप में उनकी कार्यशैली को ‘संगठन निर्माण का विश्वविद्यालय’ माना जाता है। वे उन विरले नेताओं में से हैं जो सत्ता के गलियारों से ज्यादा कार्यकर्ताओं के बीच उठते-बैठते हैं।

काशी और पूर्वांचल क्षेत्र से उनका नाता बहुत पुराना और गहरा है। विद्यार्थी परिषद के दौर में उन्होंने काशी और लखनऊ क्षेत्र में युवाओं को राष्ट्रवाद की मुख्यधारा से जोड़ा। उस दौर में प्रोफेसर दीनानाथ सिंह प्रदेश अध्यक्ष के रूप में संगठन का नेतृत्व कर रहे थे। संगठन के पुराने जानकार मानते हैं कि नागेंद्रनाथ त्रिपाठी ने उस समय जिस ‘कार्यकर्ता संस्कृति’ को सींचा, उसी ने आगे चलकर भाजपा को यूपी में वटवृक्ष बनाया। बाद में स्वर्गीय शंभूजी, राजकुमार साधक, महेंद्रजी, धर्मेंद्रजी और डॉ. राजेश कटियार जैसे मनीषियों ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाया।

सत्ता और संगठन में संतुलन की कवायद

यद्यपि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व हमेशा यह दावा करता रहा है कि सरकार “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” के सिद्धांत पर काम कर रही है और किसी भी वर्ग की उपेक्षा का प्रश्न ही नहीं उठता। फिर भी, पार्टी यह भली-भांति जानती है कि चुनावी वैतरणी पार करने के लिए अपनों का रूठना आत्मघाती हो सकता है।

यदि वर्तमान परिदृश्य को देखें, तो भाजपा ने इस वर्ग को सत्ता और संगठन में बड़ा प्रतिनिधित्व देकर संतुलन साधने का प्रयास किया है:

• बृजेश पाठक: प्रदेश सरकार में उपमुख्यमंत्री के रूप में वे सरकार का सबसे बड़ा और प्रभावशाली ब्राह्मण चेहरा हैं।

• दयाशंकर मिश्र ‘दयालु गुरु’: पूर्वांचल और काशी क्षेत्र में पैठ मजबूत करने के लिए इन्हें सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई।

• योगेंद्र उपाध्याय और रजनी तिवारी: आगरा (ब्रज) और अवध क्षेत्र का संतुलन बनाने के लिए इन्हें कैबिनेट में शामिल किया गया।

• संगठनात्मक कमान: महेंद्र नाथ पांडेय (पूर्व केंद्रीय मंत्री), नीलकंठ तिवारी और शलभमणि त्रिपाठी जैसे आक्रामक व जमीनी चेहरों के माध्यम से भाजपा लगातार इस वर्ग में अपनी पकड़ ढीली नहीं होने देना चाहती।

हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का एक धड़ा यह भी मानता है कि अतीत में कुछ ऐसी घटनाएं या आंतरिक फीडबैक भी शीर्ष नेतृत्व (जैसे अमित शाह) तक पहुंचे, जिसमें यह दावा किया गया कि यूपी का ब्राह्मण समाज कुछ निर्णयों से असहज है। नागेंद्रनाथ त्रिपाठी की नियुक्ति इसी असहजता को दूर करने का ‘एंटीडोट’ मानी जा रही है।

क्यों तुरुप का इक्का साबित हो सकते हैं त्रिपाठी?

त्रिपाठी की सबसे बड़ी ताकत है—संवाद की अचूक कला। आज भाजपा का संगठन बेहद विशाल हो चुका है, जिसमें कई बार पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस करने लगते हैं। त्रिपाठी की नई भूमिका का मूल उद्देश्य ही यही है:

1. कार्यकर्ताओं के जख्मों पर मरहम: पुराने और नाराज कार्यकर्ताओं के घर जाकर बैठना, उनकी बातें सुनना और उन्हें दोबारा मुख्यधारा में सक्रिय करना।

2. फीडबैक लूप: समाज और कार्यकर्ताओं की वास्तविक भावना को बिना किसी मिलावट के सीधे केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचाना।

3. वैचारिक जुड़ाव: जातिगत राजनीति से ऊपर उठकर पारंपरिक वोट बैंक को दोबारा राष्ट्रवाद और सुशासन के धागे में पिरोना।

2027 की चुनावी पृष्ठभूमि और भावी संकेत

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 भले ही अभी दूर दिखाई देते हों, लेकिन सूबे की सियासी बिसात पर मोहरे चलने शुरू हो चुके हैं। भाजपा जहां लगातार तीसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापसी का ऐतिहासिक लक्ष्य लेकर चल रही है, वहीं विपक्ष (विशेषकर सपा-कांग्रेस गठबंधन) सामाजिक सोशल इंजीनियरिंग के सहारे सत्ता परिवर्तन का ताना-बाना बुन रहा है।

यूपी की लगभग 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं और बाकी सीटों पर उनका वैचारिक प्रभाव अन्य समाजों को भी प्रभावित करता है। भाजपा के लिए यह वर्ग केवल ‘वोट बैंक’ नहीं, बल्कि उसकी वैचारिक यात्रा का सहयात्री रहा है।

कहने का आशय यह है कि नागेंद्रनाथ त्रिपाठी की इस नई भूमिका को महज एक पद की घोषणा के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह भाजपा की उस ‘कैच-अप’ रणनीति का हिस्सा है, जिसके जरिए वह 2027 की जंग से पहले अपने सबसे मजबूत किले की दरारों को पूरी तरह पाट देना चाहती है। आने वाला समय बताएगा कि त्रिपाठी की यह ‘मौन साधना’ चुनावी नतीजों में कितनी तब्दील होती है, लेकिन इतना तय है कि उनके आने से उत्तर प्रदेश भाजपा के भीतर ‘कार्यकर्ता संवाद’ का एक नया अध्याय अवश्य शुरू हो गया है।

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