जगन्नाथ संस्कृति, सनातन परंपरा और काशी विश्वनाथ की सांस्कृतिक चेतना का अद्भुत संगम
प्रो. (डॉ.) बिभूति भूषण मलिक कुलपति ,
राजेंद्र विश्वविद्यालय, बलांगीर, ओडिशा
भारत की सांस्कृतिक परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विविधता में निहित एकता है। उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण के सागर तक, पूर्व में श्रीजगन्नाथ धाम पुरी से लेकर पश्चिम में द्वारका तक, सनातन संस्कृति अनेक रूपों में अभिव्यक्त होती है, किंतु उसका मूल संदेश एक ही है—समरसता, लोकमंगल और ईश्वर के प्रति समर्पण। इन्हीं महान परंपराओं में पुरी की भगवान श्रीजगन्नाथ की रथयात्रा विश्व की सबसे विराट और जीवंत धार्मिक-सांस्कृतिक यात्राओं में से एक है। यह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के उस दर्शन का सजीव रूप है जिसमें भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं।
उत्तर भारत, विशेषकर काशी, प्रयाग और अयोध्या जैसे धार्मिक नगरों में भगवान शिव, श्रीराम और श्रीकृष्ण की परंपराएँ गहराई से प्रतिष्ठित हैं। किंतु भगवान जगन्नाथ की संस्कृति से अभी भी अनेक लोग पर्याप्त रूप से परिचित नहीं हैं। ऐसे में रथयात्रा केवल ओडिशा का पर्व नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत की साझा आध्यात्मिक धरोहर है, जिसे समझना और आत्मसात करना आवश्यक है।
पुरी के श्रीजगन्नाथ मंदिर का इतिहास लगभग आठ सौ वर्षों से भी अधिक पुराना है। गंग वंश के महान शासक अनंतवर्मन चोडगंग देव द्वारा निर्मित यह मंदिर केवल स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक समन्वय का भी महान प्रतीक है। भगवान जगन्नाथ की उपासना में वैष्णव, शैव, शाक्त और आदिवासी परंपराओं का अद्भुत समावेश दिखाई देता है। यही कारण है कि जगन्नाथ संस्कृति किसी एक संप्रदाय तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समूचे भारतीय समाज को एक सूत्र में बाँधती है।
भगवान जगन्नाथ के स्वरूप की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सार्वभौमिकता है। लकड़ी से निर्मित उनकी प्रतिमाएँ यह संदेश देती हैं कि सृष्टि परिवर्तनशील है, किंतु ईश्वर का तत्व शाश्वत है। समय-समय पर होने वाली नवकलेवर की परंपरा जीवन, मृत्यु और पुनर्जन्म के सनातन सिद्धांत की प्रतीक है। यह दर्शन उपनिषदों और भगवद्गीता के उस संदेश को प्रतिध्वनित करता है कि शरीर नश्वर है, आत्मा अमर है।
रथयात्रा का सबसे बड़ा आध्यात्मिक संदेश यह है कि भगवान मंदिर की सीमाओं से बाहर निकलकर स्वयं जनता के बीच आते हैं। सामान्यतः भक्त मंदिर जाकर भगवान के दर्शन करते हैं, किंतु इस एक अवसर पर भगवान स्वयं भक्तों के द्वार तक पहुँचते हैं। यह दृश्य भारतीय अध्यात्म के उस लोककल्याणकारी स्वरूप को प्रकट करता है जहाँ ईश्वर किसी वर्ग, जाति या समुदाय तक सीमित नहीं रहते। वे सबके हैं और सबके लिए हैं।
रथयात्रा का एक अत्यंत प्रेरक प्रसंग ‘छेरा पहँरा’ है। इस अनुष्ठान में पुरी के गजपति महाराज स्वर्ण झाड़ू से भगवान के रथ की सफाई करते हैं। संसार की दृष्टि में राजा सर्वोच्च सत्ता का प्रतीक होता है, किंतु भगवान के समक्ष वही राजा स्वयं को सेवक के रूप में प्रस्तुत करता है। यह दृश्य भारतीय लोकतांत्रिक चेतना और सनातन संस्कृति के उस आदर्श को अभिव्यक्त करता है जहाँ सेवा ही सर्वोच्च धर्म मानी गई है। सत्ता का वास्तविक अर्थ अधिकार नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व है।
काशी और पुरी के मध्य भी एक गहरा आध्यात्मिक संबंध है। काशी भगवान विश्वनाथ की नगरी है, जहाँ शिव स्वयं मोक्ष के अधिष्ठाता माने जाते हैं। पुरी भगवान जगन्नाथ की लीला भूमि है, जहाँ विष्णु लोकमंगल के लिए स्वयं जनता के बीच आते हैं। सनातन परंपरा में शिव और विष्णु कभी प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक माने गए हैं। “हरि हर एक हैं” की भावना भारत की सांस्कृतिक आत्मा है। जिस प्रकार काशी विश्वनाथ सम्पूर्ण भारत के आध्यात्मिक जीवन का केंद्र हैं, उसी प्रकार श्रीजगन्नाथ सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति के समन्वय और लोकमंगल के प्रतीक हैं।
काशी की देव दीपावली, नागनाथैया, रामनगर की रामलीला और गंगा आरती जिस प्रकार करोड़ों श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं, उसी प्रकार पुरी की रथयात्रा विश्व के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालुओं को अपने साथ जोड़ती है। आज लंदन, न्यूयॉर्क, मॉस्को, सिडनी और विश्व के अनेक नगरों में भी भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकाली जाती है। यह भारत की सांस्कृतिक शक्ति और सनातन परंपरा की वैश्विक स्वीकार्यता का सशक्त प्रमाण है।
इतना ही नहीं, अंग्रेज़ी भाषा का प्रसिद्ध शब्द “जगरनॉट” भी “जगन्नाथ” से ही विकसित हुआ है, जो एक ऐसी शक्ति का प्रतीक बन गया है जिसे रोकना कठिन हो। यद्यपि औपनिवेशिक काल में इस शब्द की व्याख्या कई बार विकृत रूप में की गई, फिर भी यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि जगन्नाथ संस्कृति ने विश्व की भाषाओं और सांस्कृतिक चेतना पर अपनी अमिट छाप छोड़ी।
आज जब विश्व विभाजन, संघर्ष और असहिष्णुता जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब जगन्नाथ की रथयात्रा हमें समरसता, सहअस्तित्व और सामूहिकता का संदेश देती है। रथ को खींचने में किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे समाज का योगदान होता है। वहाँ जाति, वर्ग, भाषा और क्षेत्र का कोई भेद नहीं रहता। सभी एक ही रस्सी को पकड़कर भगवान के रथ को आगे बढ़ाते हैं। यह दृश्य भारतीय लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक मूल्यों का अनुपम प्रतीक है।
उत्तर भारत के समाज के लिए भी जगन्नाथ संस्कृति केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्र की सांस्कृतिक एकात्मता को समझने का अवसर है। जिस प्रकार काशी पूरे भारत की आध्यात्मिक राजधानी है, उसी प्रकार पुरी भारत की सांस्कृतिक समन्वय परंपरा का जीवंत केंद्र है। यदि काशी शिव की करुणा का प्रतीक है, तो पुरी जगन्नाथ की लोकमंगल भावना का। दोनों मिलकर सनातन धर्म की उस व्यापक दृष्टि को प्रस्तुत करते हैं जिसमें समस्त मानवता एक परिवार है—”वसुधैव कुटुम्बकम्।”
रथयात्रा हमें यह भी सिखाती है कि धर्म केवल मंदिरों की परिधि तक सीमित नहीं है। धर्म समाज को जोड़ने, सेवा की भावना जगाने और मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का माध्यम है। यही कारण है कि भगवान जगन्नाथ को ‘पतित पावन’ कहा जाता है। वे उन सभी के भगवान हैं जो प्रेम, श्रद्धा और विश्वास के साथ उनकी शरण में आते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों की सांस्कृतिक परंपराओं को एक-दूसरे से जोड़ा जाए। काशी और पुरी के मध्य सांस्कृतिक संवाद केवल दो तीर्थों का संवाद नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा के दो महान आयामों का मिलन है। जब उत्तर भारत का समाज जगन्नाथ संस्कृति को समझेगा और पूर्वी भारत काशी की परंपरा को आत्मसात करेगा, तब “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की संकल्पना और अधिक सशक्त होगी।
रथयात्रा अंततः हमें यही संदेश देती है कि ईश्वर किसी एक स्थान, वर्ग या संप्रदाय के नहीं हैं। जब भगवान स्वयं अपने सिंहासन से उतरकर जनसाधारण के बीच आते हैं, तब वे पूरी मानवता को यह स्मरण कराते हैं कि प्रेम, सेवा, समानता और लोककल्याण ही सनातन धर्म का वास्तविक स्वरूप है। यही श्रीजगन्नाथ की संस्कृति का शाश्वत संदेश है, और यही भारत की अमर सांस्कृतिक चेतना की सबसे बड़ी पहचान भी।















